श्रावण के महीने में पढ़े शिव जी की आरती | Shiv Chalisa Aarti जिसे पढ़ने और सुनने से आनंद की प्राप्ति होती है | दोस्तों आज के इस पोस्ट में हम आपके लाये है शिव चालीसा और शिव जी आरती जिसे आप पीडीऍफ़ डाऊनलोड कर सकते हैं |
शिव जी की आरती | Shiv Chalisa Aarti
ॐ जय शिव ओंकारा
जय शिव ओंकारा ॐ जय शिव ओंकारा।
ब्रह्मा विष्णु सदा शिव, अर्द्धांगी धारा। ॐ जय शिव ओंकारा।
एकानन चतुरानन , पंचानन राजे |
हंसासन गरुड़ासन वृषवाहन साजे | | ॐ जय शिव ओंकारा
दो भुज चारु चतुर्भुज , दस भुज अति सोहे |
त्रिगुण रूप निरखता , त्रिभुवन जान मोहे || ॐ जय शिव ओंकारा
अक्षमाला बनमाला , रुण्डमाला धारी |
चन्दन मृगमद मोहे , भाले शशिधारी | | ॐ जय शिव ओंकारा
श्वेताम्बर पीताम्बर , बाघम्बर अंगे |
सनकादिक ब्रम्हादिक , भूतादिक संगे | | ॐ जय शिव ओंकारा
कर के मधय कमंडलु , चक्र त्रिशूल धर्ता |
जगकर्ता जगभर्ता , जगसंहारकर्ता | | ॐ जय शिव ओंकारा
ब्रम्हा विष्णु सदा शिव , जानत अविवेका |
प्रणवाक्षर के मध्ये, ये तीनो एका || ॐ जय शिव ओंकारा
काशी में विश्वनाथ विराजत , नंदी ब्रह्मचारी |
नित उठि भोग लगावत , महिमा अति भारी || ॐ जय शिव ओंकारा
त्रिगुण शिव जी की आरती , जो कोई नर गावे |
कहत शिवानंद स्वामी , मनवांछित फल पावे || ॐ जय शिव ओंकारा
Shiv Chalisa Aarti
|| दोहा ||
जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल मूल सुजान |
कहत अयोध्या दास, तुम देहु अभय वरदान ||
||चौपाई ||
जय गिरिजा पति दिन दयाला | सदा करत संतन प्रतिपाला ||
भाल चन्द्रमा सोहत नीके | कानन कुण्डल नागफनी के ||
अंग ग़ौर शिर गंग बहाये | मुण्डमाल तन क्षार लगाए ||
वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे | छवि को देखि नाग मन मोहे ||
मैना मातु की हवे दुलारी | बाम अंग सोहत छवि न्यारी ||
कर त्रिशूल सोहत छवि भारी | करत सदा शत्रुन छयकारी ||
नंदी गणेश शोहै तहँ कैसे | सागर मध्य कमल है जैसे ||
कार्तिक श्याम और गणराऊ | या छवि को कही जात न काऊ ||
देवन जबहीं जाय पुकारा | तब ही दुःख प्रभु आप निवारा ||
किया उपद्रव तारक भारी | देवन सब मिलि तुम्हिं जुहारी ||
तुरत षडानन आप पठायउ | लवनिमिषः महँ मारी गिरायउ ||
आप जालंधर असुर संहारा | सुयश तुम्हार विदित संसारा ||
त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई | सबहिं कृपा कर लीन बचाई ||
किया तपहिं भागीरथ भारी | पुरब प्रतिज्ञा तासु पुरारी | |
दानिन महँ तुम सम कोउ नाहीं | सेवक स्तुति करत सदाहीं ||
वेद नाम तब महिमा गाई | अकथ अनादि भेद नहीं पाई ||
प्रकटी उदधि मंथन में ज्वाला | जरत सुरासुर भये विहाला ||
किन्ही दया तहं करि सहाई | नीलकंठ तब नाम कहाई ||
पूजन रामचंद्र जब कीन्हा | जीत के लंक विभीषण दीन्हा ||
सहस कमल में हो रहे धारी | कीन्ह परीक्षा तबहिं पुरारी ||
एक कमल प्रभु राखेउ जोई | कमल नयन पूजन चहं सोई ||
कठिन भक्ति देखि प्रभु शंकर | भये प्रसन्न दिए इच्छित वर ||
जय जय जय अनंत अविनाशी | करत कृपा सब के घट वासी ||
दुष्ट सकल नित मोहि सतावै | भ्रमत रहौं मोहि चैन न आवै ||
त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारो | येहि अवसर मोहि आन उबारो ||
लै त्रिशूल शत्रुन को मारो | संकट से मोहि आन उबारो ||
माता पिता भ्राता सब होई | संकट में पूछत नहिं कोई ||
स्वामी एक है आस तुम्हारी | आय हरहु मम संकट भारी ||
धन निर्धन को देत सदा हीं | जो कोई जाचे सो फल पाहीं
||
अस्तुति केहि विधि करैं तुम्हारी | क्षमहु नाथ अब चूक हमारी ||
शंकर हो संकट के नाशन | मंगल कारण विघ्न विनाशन ||
योगी यति मुनि धयान लगावैं | शारद नारद शीश नवावैं ||
नमो नमो जय नमः शिवाय | सुर ब्रम्हादिक पार न पाय ||
जो यह पाठ करे मन लाई | तापर होत है शम्भू सहाई ||
ऋनियां जो कोई हो अधिकारी | पाठ करे सो पावन हारी ||
पुत्र हीन कर इच्छा जोई | निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई ||
पंडित त्रयोदशी को लावे | ध्यान पूर्वक होम करावे ||
त्रयोदशी व्रत करै हमेशा | ताके तन नहीं रहे कलेशा ||
धुप दीप नैवेद्य चढ़ावे | शंकर सम्मुख पाठ सुनावे ||
जन्म जन्म के पाप नसावे | अंत धाम शिवपुर में पावे ||
कहै अयोध्यादास आस तुम्हारी | जानी सकल दुःख हरहु हमारी ||
दोहा
नित्त नेम कर प्रातः ही, पाठ करौं चालीसा |
तुम मेरी मनोकामना , पूर्ण करो जगदीशा ||
मगसर छठि हेमंत ऋतु, संवत चौसठ जान |
अस्तुति चालीसा शिवहि, पूर्ण कीन कल्याण | |
प्रेम से बोलिये शिव शंकर भगवान् जय |
संत भगवान् की जय |