आज के समय में हम सब जानते हैं कि हनुमान जी केवल एक देवता नहीं बल्कि उनके अंदर अद्भुत बल, अद्भुद भक्ति, ज्ञान तथा सेवा करने में सबसे आगे रहते हैं। हनुमान जी की पूजा भारत में ही नहीं बल्कि दुनिया भर में करोड़ो भक्त उन्हें संकटमोचन पवनपुत्र, और श्री राम के परम भक्त के रूप में करते हैं।
लेकिन आपने कभी सोचा है कि हनुमान जी का जन्म कैसे हुआ? उनके जन्म लेने का उद्देश्य क्या था . और उन्हें भगवान शिव जी का रुद्रावतार क्यों कहा जाता है?
तो आइए जानते हैं इस कथा को विस्तार से।
हनुमान जी का जन्म कब हुआ?
शास्त्रो और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार हनुमान जी का जन्म चैत्र मास की पूर्णिमा तिथि को हुआ था। इसी दिन पुरे देश , विदेश में पूर्ण श्रद्धा और जबरदस्त उत्सव के साथ हनुमान जी का जन्म बड़ी उत्सव के साथ मनायी जाती है।
और इस शुभ दिन के अवसर पर भक्त जन हनुमान चालीसा का पाठ, सुंदरकांड का पाठ, बजरंग बाण का पाठ करते हैं तथा मंदिरों में जाकर श्री हनुमान जी को सिन्दूर, चमेली का तेल और प्रसाद चढ़ाते हैं। गरीबों को भोजन और दान देते हैं।
हनुमान जी के माता-पिता कौन थे?
हनुमान जी की माता का नाम अंजना और उनके पिता का नाम वानरराज केशरी था। उसकी माता अंजना भगवान शिव जी के परम भक्त और तपस्वनी थी। उन्होंने पुत्र प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की।
उनकी कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव उन्हें पुत्र होने का वरदान दिया। हनुमान जी को अनेक नामों से जाना जाता है। अंजनि पुत्र पवनपुत्र केसरीनंदन, बजंरागबली, मारुति आंजनेय आदि।
हनुमान जी को पवनपुत्र क्यों कहा जाता है?
यह सवाल आपके मन में आ रहा होगा: हनुमान जी पवनपुत्र क्यों कहा जाता है जबकि उनके पिता का नाम केसरी है। यह कथा उस समय की है जब माता अंजना भगवान शिव जी आराधना कर रही थी, उसी समय भगवान शिव जी दिव्य तेज प्रकट हुए जिससे पवन देव जी के माध्यम से माता अंजना तक पहुंचाया।
पवन देव दिव्य शक्ति को सुरक्षित रूप से माता अंजना के गर्भ तक पहुंचाया। इसी कारण से हनुमान जी को पवनपुत्र कहा जाता है।
हनुमान जी भगवान शिव जी रुद्रावतार
पुराणों के अनुसार जब भगवान विष्णु जी ने श्री राम के रूप में अवतार लेने का निर्णय किया, तब भगवान शिव जी भी उनकी मदद करने के लिए अपने अंश से अवतार लेने का संकल्प लिया।
इसी उद्देश्य से हनुमान जी का जन्म हुआ। इसलिए उन्हें भगवान शिव का आकाशीय रुद्र या रुद्रावतार भी कहा जाता है।